ये वो सहर तो नहीं

सामने टियर गैस छोड़ने वाली गाड़ी खड़ी थी और मैं ठीक उसके निशाने पर थी इस प्रोटेस्ट को कवर कर रही थी, कुछ मिनटों के बाद ही सामने से एक टियर गैस का गोला दागा गया, बहुत मुमकिन था को वो सीधे आ कर मुझे लगता, ग़नीमत रही कि ऐसा नहीं हुआ। टियर गैस फैलते ही मेरी आंखों से लगातार पानी निकलने लगा, वो सुर्ख़ हो गईं, चेहरा जलने लगा, देखते ही देखते ऐसा फिर हुआ और इस बार मेरी नज़र आसमान पर गई, देखा बरसते आसमान पर बेचैन परिंदे घबराए से उड़ रहे थे।

एक तरफ़ ज़मी पर प्रोटेस्ट में हिस्सा लेने आए छात्र और उनके परिवार वालों के चेहरों पर ग़ुस्सा और सवाल दिखाई दे रहे थे तो वहीं दूसरी तरफ़ आसमान पर बेचैन परिंदे मंडरा रहे थे।  ज़मीं से लेकर आसमान तक दिल्ली में 20 जुलाई के दिन ये अजीब माहौल दिखा।

(आंसू गैस के गोले से बच कर भागते छात्र) 

तभी देखा एक लड़का अपनी शर्ट उतार कर पीठ पर पड़े लाठी के निशान दिखा रहा था, जिसे देख एक छात्र ने ग़ुस्से में कहा कि ”गोली मारते हैं, मार दें अब यहीं बैठे हैं, अब नहीं हिलते, हम आराम से बैठे थे लेकिन इन्होंने लाठी चार्ज शुरू कर दिया, आंसू गैस के गोले फेंकने शुरू कर दिए, एक 12 साल की लड़की का सिर फट गया, अब हम क्या करें, क्या करें हम?”

वहीं एक महिला के साथ कुछ टीन एज लड़कियां दिखाई दी जो इस प्रोटेस्ट में हिस्सा लेने पहुंची थी वे कहती हैं ”इतना बुरा कौन करता है? इतना तो अंग्रेज़ों ने भी नहीं किया था जितना ये अपने देश के लोगों के साथ कर रहे हैं, ये हैं डेमोक्रेटिक लोग?  इस देश में लोकतंत्र नहीं बचा है ये तानाशाही है” इन लड़कियों से साथ आई महिला ने कहा कि ” ये गुंडाराज है, गुंडाराज” जिस वक़्त ये लड़कियां मुझ से बात कर रही थीं लगातार अपनी आंखों को पोछ रही थीं, इनके चेहरे गुस्से से तमतमाए हुए थे। 

ये मंज़र दिल्ली के टॉलस्टॉय मार्ग का था जो जंतर-मंतर की तरफ जाता है, ये उसी महान विचारक और दार्शनिक टॉलस्टॉय के नाम के ऊपर है जिन्होंने ‘वॉर और पीस’ जैसा उपन्यास लिखा था जिसे लोग आज तक पढ़ते हैं। ये वही विचारक हैं जिनकी रचनाओं में सत्य, अहिंसा के विचारों ने महात्मा गांधी को इतना प्रभावित किया था कि उन्होंने दक्षिण अफ्रिका में अपने सत्याग्रह के दौरान उनके नाम एक बस्ती का नाम टॉलस्टॉय फॉर्म रखा था। 

(टॉलस्टॉय मार्ग) 

ज़रा सोचिए, जिस महान दार्शनिक के अहिंसा के विचारों का गांधी जी पर इतना असर था आज उन्हीं के नाम की इस सड़क ने इतिहास में कैसा आंदोलन दर्ज किया?

बेशक, दिल्ली की ये सड़कें 26 जुलाई 2026 को बुलाए गए ‘संसद चलो’ प्रोटेस्ट की गवाह बन गई। सुबह से बारिश और लोगों के संसद की तरफ बढ़ने का सिलसिला जो शुरू हुआ वो देर रात तक चलता रहा। 

इस दौरान सोशल मीडिया भी प्रोटेस्ट की तमाम वीडियो और तस्वीरों से भर उठा, कई तस्वीरों ने पूरे देश को झकझोर दिया ऐसा ही एक वीडियो था जिसमें एक शख़्स को आरएएफ (रैपिड एक्शन फोर्स) के जवान लाठी से मारते दिखे और लेकिन उसने भागने की बजाए कहा ” मारो सर मारो”

इस शख़्स को देखकर लग रहा था कि जैसे अब डर ख़त्म हो गया हो, ये वीडियो अकेला नहीं था ऐसे तमाम सोशल मीडिया पर वायरल हुए जिसमें युवाओं ने लाठियों से डरकर भागने की बजाए लाठी खाना क़बूल किया। ये माहौल एक बार फिर गोरख पाडे की कविता ‘उनका डर’ याद दिला गया। 

वे डरते हैं

किस चीज़ से डरते हैं वे

तमाम धन-दौलत

गोला-बारूद पुलिस-फ़ौज के बावजूद? 

वे डरते हैं 

कि एक दिन 

निहत्थे और ग़रीब लोग 

उनसे डरना बंद कर देंगे 

घर से निकले ये छात्र पिछले कई सालों से लगातार पेपर लीक से परेशान थे, लेकिन जब अब अपनी आवाज़ संसद तक पहुंचाने घर से निकले तो मायूसी लेकर घर लौटे। 

इस बात से इनकार नहीं किया जा सकता कि अगर छात्रों को गंभीर चोटें आई हैं तो घायल पुलिस और सुरक्षा बल के जवान भी हुए, दोनों तरफ ही बेबसी थी एक तरफ छात्र अपने भविष्य को लेकर परेशान थे तो दूसरी तरफ पुलिस-प्रशासन उन आदेशों का पालन कर रहा था जो ‘ऊपर’ से दिए जा रहे थे। 

बेशक, दिल्ली की पत्रकार के तौर पर मैंने यहां कई छोटे और बड़े आंदोलन देखे हैं, निर्भया हो या फिर अन्ना आंदोलन या फिर किसान आंदोलन हर जगह अपनी मौजूदगी दर्ज की लेकिन ये प्रोटेस्ट कवर करने के बाद दिल बहुत उदास था जो मंजर मैंने देखे यक़ीनन वो कभी भूले नहीं जा सकते, घर लौटते वक़्त ज़ेहन अजीब हो गया था कभी बहुत से विचार एक साथ हलचल पैदा कर रहे थे तो कभी अजीब ख़ालीपन तारी हो गया। 

(प्रदर्शन के दौरान एक छात्र) 

सोच रही थी 20- 21 दिन बाद  15 अगस्त को हम अपना 80वां स्वतंत्रता दिवस मनाने वाले हैं और ऐसे में दिल्ली की सड़कों पर उसके युवा इस तरह से लाठी खा रहे हैं और वो भी सिर्फ बेहतर शिक्षा के लिए। ये सब मुझे फ़ैज़ अहमद फ़ैज़ की 1947 में लिखी नज़्म  ‘सुब्ह-ए-आज़ादी’ की याद दिला रहे थे- 

दे दाग़-दाग़ उजाला ये शब-गज़ीदा सहर 

वो इंतिज़ार था जिस का ये वो सहर तो नहीं 

ये वो सहर तो नहीं जिस की आरज़ू ले कर 

चले थे यार कि मिल जाएगी कहीं न कहीं 

फ़लक के दश्त में तारों की आख़िरी मंज़िल

कहीं तो होगा शब-ए-सुस्त मौज का साहिल 

अभी गिरानी-ए-शब में कमी नहीं आई 

नजात-ए-दीदा-ओ-दिल की घड़ी नहींं आई

चले चलो कि वो मंज़िल अभी नहीं आई

( नाज़मा ख़ान की रिपोर्ट)

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